कुछ रिश्ता ये ऐसा बन रहा है तेरे मेरे बीच, में हैरान हु इसकी रफ़्तार से...
मुस्तक़बिल नहीं बनता कोई तेरे मेरे बीच..फिर भी शिकवा रहेगा तेरी रुस्वाई से...
कोई मंजिल नज़र आती नहीं, और ये सफर न हो ख़तम , है अजीब फिर भी गुरेज़ नहीं ऐसी ख्वाइश से...
देखता हु तुझे हसरत भर कर, कभी आह भर कर, दर्द से सना ये राज़ जज़्ब फिर भी करता हु मुस्कराहट से...
न जाने कैसी एक तरफ़ा मुहब्बत है, बेमुरव्वत सी लगती है, बस अर्ज़ है काबू में रहे ज़ज्बात इस दिल-ऐ-नादाँ से..
-प्रशांत 17 Jun 2020
मुस्तक़बिल नहीं बनता कोई तेरे मेरे बीच..फिर भी शिकवा रहेगा तेरी रुस्वाई से...
कोई मंजिल नज़र आती नहीं, और ये सफर न हो ख़तम , है अजीब फिर भी गुरेज़ नहीं ऐसी ख्वाइश से...
देखता हु तुझे हसरत भर कर, कभी आह भर कर, दर्द से सना ये राज़ जज़्ब फिर भी करता हु मुस्कराहट से...
न जाने कैसी एक तरफ़ा मुहब्बत है, बेमुरव्वत सी लगती है, बस अर्ज़ है काबू में रहे ज़ज्बात इस दिल-ऐ-नादाँ से..
-प्रशांत 17 Jun 2020