फकत कट जाये चार दिन तो ज़िन्दगी है.. वरना मर मर कर भी क्या कोई जीना है..
ये दिन और रात की उदासी में..उनके बिना कट रहे हैं अब तन्हाई में...
कुसूर कही तो मेरा ही था..ये जान भी न पाए थे.. की फांसले बन गए...
दर-ओ-दीवार के पीछे और दूरियों के साए में...वो क्या सुन पाएंगे मेरे दिल की आवाज इस शोर में..खुद में तुफान मचाये जो बैठे हैं..
हालत गर वो गौर करते..मेरे दिल को जान पाते..था कुसूर पर नासमझी मेरी माफ़ करते..काश वो मेरी गुज़ारिश पे गौर करते..
वो समझे भी तो कैसे समझे ये जबान भी तो अनजानी है...पहुच भी न पाए ये लफ्ज़ तो क्या खाक होगा..बस उम्मीद है की कभी तो यकीन होगा..
तडपे थे उनके लिए बेइंतिहा इसका कभी तो उनको भी इल्म होगा...बस कुबूल करे मेरी माफ़ी इस वक़्त इतना ही काफी होगा..
-प्रशांत माथुर
Monday, December 26, 2011
Monday, December 19, 2011
..
samandar ke tufano ke aage...regitan ki aandhiyo ke aage jeete..
ek berukhi ne tere aise maara...mohabbat mai jake haare...
-prashant mathur
ek berukhi ne tere aise maara...mohabbat mai jake haare...
-prashant mathur
Tuesday, December 6, 2011
waqt-e-gardish
waqt-e-gardish mai yo dhuan na kar mere ajeez...
hath bichade hain...furqat ko bahana milne na paye...
-prashant mathur
hath bichade hain...furqat ko bahana milne na paye...
-prashant mathur
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